"प्रियतमें! मै प्यार तुमसे मागता हूँ ।।
जब कभी मै व्यग्र था यू वेदना के तीब्र ज्वर से,
जब हुआ अभिशप्त जग नियमावली के तीक्ष्ण शर से,
उस अँधेंरे पाथ पर प्रिय! दीप तब तुमने जलाया,
नाव तब तुमने निकाली निर्दयी जग के भवर से,
घाव पर तब लेप मेरे स्नेह का तुमने लगाया,
प्रिय! उसी क्षण का पुन: अधिकार तुमसे माँगता हूँ ।
प्रियतमे!..........…………………………………!!
पीर मेरी हर सके दुर्जेय वह मुस्कान दे दे,
गा सकू अपने लरजते होठ से वह गान दे दे,
और कुछ ओ मदनिके! तुमसे न मेरी लालसा है,
मात्र मेरे स्वप्न आँसू प्रिति को सम्मान दे दे ।
जी सकूँगा शीश रखकर री! तुम्हारे अंक मे मै,
मै यही केवल यही उपहार तुमसे माँगता हूँ ।
प्रियतमे!.............………………………!!"
ये न तय है कब तलक तेरा मेरा ये साथ होगा,
कब तलक इक दुसरे के हाथ मे ये हाथ होगा,
कब ये जग अपने प्रणय को वासना का नाम देदे,
संकटों का कब घिरे बादल न कोई पाथ होगा,
उस विकट क्षण मे जहा छाया न देगी साथ तेरा,
मै तेरे विश्वास का प्रतिकार तुमसे मागता हूँ ।
प्रियतमें!................……....………………!!"
जब कभी मै व्यग्र था यू वेदना के तीब्र ज्वर से,
जब हुआ अभिशप्त जग नियमावली के तीक्ष्ण शर से,
उस अँधेंरे पाथ पर प्रिय! दीप तब तुमने जलाया,
नाव तब तुमने निकाली निर्दयी जग के भवर से,
घाव पर तब लेप मेरे स्नेह का तुमने लगाया,
प्रिय! उसी क्षण का पुन: अधिकार तुमसे माँगता हूँ ।
प्रियतमे!..........…………………………………!!
पीर मेरी हर सके दुर्जेय वह मुस्कान दे दे,
गा सकू अपने लरजते होठ से वह गान दे दे,
और कुछ ओ मदनिके! तुमसे न मेरी लालसा है,
मात्र मेरे स्वप्न आँसू प्रिति को सम्मान दे दे ।
जी सकूँगा शीश रखकर री! तुम्हारे अंक मे मै,
मै यही केवल यही उपहार तुमसे माँगता हूँ ।
प्रियतमे!.............………………………!!"
ये न तय है कब तलक तेरा मेरा ये साथ होगा,
कब तलक इक दुसरे के हाथ मे ये हाथ होगा,
कब ये जग अपने प्रणय को वासना का नाम देदे,
संकटों का कब घिरे बादल न कोई पाथ होगा,
उस विकट क्षण मे जहा छाया न देगी साथ तेरा,
मै तेरे विश्वास का प्रतिकार तुमसे मागता हूँ ।
प्रियतमें!................……....………………!!"
--🙏कुमार आशू ✍️ से
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